जंतुओं का वर्गीकरण हिंदी में jantuon ka vargikaran
हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख जंतुओं का वर्गीकरण हिंदी में (jantuon ka vargikaran) में।
दोस्तों इस लेख द्वारा आज आप जंतुओ का वर्गीकरण और नामकरण आदि के बारे में जान पाएंगे। तो आइये शुरू करते है जंतुओ का वर्गीकरण:-
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जंतु जगत क्या है What is animal kingdom
साधारण रूप से वे सभी जीवित प्राणी जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर आ जा सकते हैं, तथा उनमें जीवन से संबंधित सभी प्रकार की क्रियाएँ जैसे प्रजनन पाचन आदि होती हैं, उन सभी को जंतु जगत के अंतर्गत रखा गया है। जंतु जगत एक विशाल जगत है,
जिसमें वर्तमान में लगभग 12.5 लाख प्रजातियाँ (Species) ज्ञात है, किंतु इसमें इतनी अधिक प्रजातियाँ होने के कारण यह बड़ी ही विचित्रता से भरा हुआ है, इसके अंतर्गत जीवित और अजीवित विलुप्त कई प्रजातियाँ भी सम्मिलित हैं।
प्राणियों के द्वारा अद्भुत विविधता प्रदर्शित करना विभिन्न क्रियाओं के द्वारा जंतुओं को अपनी सक्रियता स्पष्ट करना आदि के आधार पर ही जंतुओं का जीवित और अजीवित होना स्पष्ट किया जाता है, इसलिए जंतु विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत जंतुओं को समानता और असमानता के आधार पर विभाजित किया जाता है वर्गीकरण विज्ञान कहलाती है।
जंतुओं का वर्गीकरण विज्ञान Taxonomy of animals
जंतु जगत में कई लाख प्रजातियाँ है, इसीलिए उनकी व्यवस्था और अव्यवस्था को देखते हुए जंतुओं का वर्गीकरण आवश्यक हो जाता है। सिंपसन (Simpson) ने 1961 में प्राणियों के नामकरण की व्याख्या की और कहा किसी भी रचित प्राणी वर्गीकरण में प्रमाणित जंतु समूह के प्रत्येक समूह के लिए विशिष्ट नाम का अनुप्रयोग ही प्राणी नामकरण कहलाता है।
उन्होंने वर्गीकरण की व्याख्या इस प्रकार से की है, कि जंतुओं को उनके पारस्परिक संबंधों लक्षणों की समानता अथवा और असमानता तथा दोनों के द्वारा स्थापित संगठनों के आधार पर छोटे बड़े समूह में क्रमबद्ध करना ही प्राणी वर्गीकरण कहलाता है।
वर्गीकरण की पद्धतियाँ Methods of classification
संसार में कई जंतु वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होंने जंतुओं को विभिन्न आधार पर वर्गीकृत करने की कोशिश की जिनको निम्न प्रकार की पद्धतियों में विभाजित किया गया है:-
कृत्रिम वर्गीकरण Artificial classification
यह वर्गीकरण प्रमुख रूप से शुरुआती वैज्ञानिकों के द्वारा किया गया है, जिसमें उन वैज्ञानिकों ने जीव जंतुओं के बाह्य लक्षण देखें और उनके रंग उनके रूप और आकार स्वभाव स्थिति के आधार पर उनको वर्गीकृत कर दिया जैसे कि वैज्ञानिकों ने जल में रहने वाले जंतुओं को जलीय जंतु (Aquatic animals) कहा जमीन पर रहने वाले जंतुओं को थलीय जंतु (land animals) कहा इसी प्रकार से वैज्ञानिकों ने जो जंतु वनस्पतियों को खाते हैं,
उन्हें शाकाहारी (Vegetarian) जो जंतु वनस्पतियों को नहीं खाते हैं, मांस खाते हैं, उन्हें मांसाहारी (Non-vegetarian) जबकि वनस्पति और मास दोनों को खाने वाले जंतुओं को सर्वाहारी (Omnivorous) का नाम प्रदान किया। इस प्रकार का वर्गीकरण करने में सबसे प्रमुख योग्य वैज्ञानिक अरस्तु और जॉन रे (Aristotle and John Ray) थे।
जॉन रे वैज्ञानिक ने 1627 - 1705 जाति को एक जनको से उत्पन्न संतानों का समूह बताया है और उन्होंने विभिन्न जातियों का प्राकृतिक संरचनात्मक संबंधों के आधार पर उनको वर्गीकृत किया और निकट संबंधित जातियों के समूह को वंश के नाम से संबोधित भी किया। इसके बाद कैरोलस लीनियस (Carolus linnaeus) जिनका प्रारंभिक नाम कार्ल वॉन लिने था,
उन्होंने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (Systema Naturae) 1935 में प्रकाशित की, उस समय उसमें कई हजार जीव जातियों के द्विपद नामों का ठीक प्रकार से वर्गीकरण किया गया और इसके बाद उन्होंने अपने इस पुस्तक के दसवें संस्करण 1758 में वर्गीकरण की विधि को वर्तमान में स्थापित प्रणाली
का आधार बनाया गया। उस समय कार्ल वॉन लिने ने प्राणी जगत को छह भागों में विभाजित किया था, जिसमें प्रथम वर्ग चतुष्पाद चार पैर वाले प्राणी का था दूसरा वर्ग पक्षियों का तीसरा सरीसृप का चौथा मृत्स्य का पांचवा कीट का और छठवाँ कृमि का था।
प्राकृतिक वर्गीकरण Natural classification
प्राकृतिक वर्गीकरण का आधार जीव जंतुओं के जीव विकास के सिद्धांत पर आधारित था। यह विकास प्रमुख रूप से प्राणियों में संरचनात्मक, क्रियात्मक, भ्रूणीय और अनुवांशिक संबंध पर आधारित माना जाता है।
प्राकृतिक वर्गीकरण के अनुसार जंतुओं को ऊपर से नीचे की ओर क्रमश: बड़े से छोटे समूहों में बांटा गया है, जिनमें से सबसे पहले संघ (Phylum) वर्ग (Class) गण (Order) कुल (Family) के बाद वंश (Genera) और वंश के बाद जाति (Species) का स्थान आता है। प्राकृतिक वर्गीकरण में संघ जीव जातियों का सबसे बड़ा समूह है
और जाति जीव जंतुओं का सबसे छोटा समूह माना जाता है. जंतुओं के प्राकृतिक वर्गीकरण का प्रतिपादन प्रसिद्ध वैज्ञानिक कैरोलस लीनियस ने 1707 - 1778 में किया था। उन्होंने वर्गीकरण की सबसे छोटी इकाई जाति को बताया था, जिसके सभी जंतु लगभग एक समान गुणों को प्रदर्शित करते हैं।
इसके बाद अर्नेस्ट हैनरिक हीकल (Ernst Heinrich Haeckel) और ई रे लेंकेस्टर (E. Ray Lankester) ने आधुनिक प्राणी वर्गीकरण के प्रमुख सिद्धांतों की भी रूपरेखा प्रस्तुत की जिसे आधुनिक प्राणी विज्ञान के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण स्थायित्व प्राप्त हुआ।
जीव जंतुओं के वर्गीकरण का इतिहास History of classification of animals
जीव जंतुओं अर्थात जंतु जगत के वर्गीकरण का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। यह इतिहास पांचवी आठवीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ ऐसा माना जाता है, जिसका प्रथम वर्गीकरण वैज्ञानिक ने प्रमुख रूप से खाध और अखाध के आधार पर किया था,
किंतु ग्रीक विचारकों ने जीवो को तीन भागों में बांटा जैसे कि पौधे जंतु और मानव इसके बाद आधुनिक वर्गीकरण आता है, जिसमें सबसे प्रमुख योगदान कार्ल वॉन लिने (Carl von Linne) का था और उन्होंने ही 1707 से 1778 में आधुनिक वर्गीकरण की पद्धति का विकास किया। यह स्वीडन के एक बहुत ही प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे
इनके प्रयास के कारण ही वर्गीकरण विज्ञान की एक नई शाखा सामने आई इसीलिए इनको आधुनिक वर्गीकी विज्ञान (Taxonomy) का जनक के रूप में भी जाना जाता है। आधुनिक वर्गीकरण वैज्ञानिकों ने वर्गीकरण के लिए 30 इकाइयों का निर्माण किया है,
जिनमें से प्रमुख रूप से जगत, संघ, वर्ग, गण, कुल, वंश, जाति को महत्व दिया गया है, जिनमें से जाति वर्गीकरण की सबसे मूलभूत और आधारभूत इकाई होती है। इसके द्वारा विशिष्ट जीव के आकारीय कार्यक़ीय की और अनुवांशिक लक्षण प्रदर्शित किए जाते हैं।
जातियों का नामकरण Nomenclature of species
जीव जंतु दुनिया के हर क्षेत्र में पाए जाते हैं, इसलिए वहाँ की स्थानीय भाषा भी अलग-अलग होती है। इसीलिए उन जीवो को उनके क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है. जैसे कि अगर हम बात करें साधारण घरेलू चिड़िया की जिसको भारत-पाकिस्तान में गोरैया के नाम से जाना जाता है, तो वहीं इंग्लैंड में उसे स्पारो और जर्मनी में हॉस्टरलिंग कहा जाता है।
इसीलिए एक ही जीव के लिए अलग-अलग नामों का प्रयोग हो जाता है किन्तु जब वैज्ञानिक कुछ विशेष जाति को पहचान करके उसका ठीक प्रकार से वैज्ञानिक वर्गीकरण कर देते हैं और उसे एक उपयुक्त निर्धारित नाम दे देते हैं, जिसे वैज्ञानिक नाम कहा जाता है तब उस जीव को उस वैज्ञानिक नाम के द्वारा ही संपूर्ण विश्व में पहचाना जाता है। जैसे कि संपूर्ण संसार में गौरैया या स्पारो को पेंसर डोमेस्टिका (Penser Domestica) कहा जाता है, जोकि गौरैया का वैज्ञानिक नाम है।
द्विनाम पद्धति Binomial system
संसार के विभिन्न क्षेत्रों में एक ही प्राणी को अलग अलग नाम से पुकारा जाता है, इसलिए इस प्रकार की विषमता को दूर करने के लिए कैरोलस लीनियस ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (Systema Naturae) में जीव जाति के नामकरण की द्विनाम पद्धति प्रतिपादित की, जिससे एक वैज्ञानिक नाम प्राप्त होता है और उस नाम से ही उस प्राणी को संपूर्ण जगत में जाना जाता है।
संसार के सभी प्राणियों का वैज्ञानिक नाम दो नामों से मिलकर बना होता है, जो लैटिन भाषा का होता है, जिसमें प्रथम नाम वंश का नाम और द्वितीय नाम जाति के नाम को दर्शाता है, जैसे कि गौरैया का वैज्ञानिक नाम पैसर डॉमेस्टिका होता है, जिसमे पैसर इसके वंश का नाम और डॉमेस्टिक जाति के नाम को प्रदर्शित करता है। यहाँ पर किसी भी प्राणी के वैज्ञानिक नाम को लिखते समय उसके वंश के नाम का पहला अक्षर हमेशा बड़े अक्षर में लिखा जाता है, जबकि जाति का पहला अक्षर हमेशा छोटे अक्षरों में ही लिखा जाता है।
त्रिनाम पद्धति Trinomial method
कुछ जीव जंतुओं की ऐसी जातियाँ भी होती हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार के वातावरण में रहने के कारण अपने आप में आसमानता विकसित हो जाती है, इसलिए उन जातियों की उप जातियों का भी निर्धारण करना आवश्यक हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसको उपजाति ही मान लेते हैं और इसका एक उपजाति नाम भी निर्धारित करके वैज्ञानिक नाम के साथ छोड़ दिया जाता है। इस पद्धति को ही त्रिनाम पद्धति कहा जाता है, क्योंकि यह द्विनाम पद्धति के नाम के पीछे लगती है, जैसे कि उदाहरण स्वरूप हम देखते हैं,
कौवे का वैज्ञानिक नाम कोर्वस स्प्लेंडेंस होता है जो भारत और भारत के कई पड़ोसी देशों में पाया जाता है। जमीन पर विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों के कारण उनमें परिवर्तन होकर कुछ आसमानतायें उत्पन्न हो जाती हैं, तब इन कौवे की उपजातियाँ बन जाती हैं जिसमें भारतीय कौवे को कोर्वस स्प्लेंडेंस स्प्लेंडेंस (Corvus splendens splendens) म्यांमार के कौवे को कोर्वस स्प्लेंडेंस आइसोलेन्स(Corvus splendens isolens ) और श्रीलंका के कौवे को कोर्वस स्प्लेंडेंस प्रोटीगेट्स (Corvus splendens protegatus) के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा जो वैज्ञानिक उपजाति की खोज करता है, उसका नाम भी उस जीव जाति के पीछे छोड़ दिया जाता है।
दोस्तों आपने यहाँ पर जंतुओं का वर्गीकरण हिंदी में (jantuon ka vargikaran) तथा अन्य कई तथ्य पढ़े। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।
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