वैदिक काल और बौद्ध काल में स्त्री शिक्षा Women''s education in vedic or buddhist periods

वैदिक काल में नारी की शिक्षा Women's education in Vedic period

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दोस्तों यहाँ पर आप वैदिक काल में स्त्री शिक्षा, तथा बौद्ध काल की स्त्री शिक्षा के बारे में पड़ेंगे। तो आइये शुरू करते है, यह लेख वैदिक काल में नारी की शिक्षा:-


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वैदिक काल में नारी की शिक्षा


वैदिक काल में स्त्री शिक्षा Women's education in Vedic period

प्राचीन काल में स्त्रियों का समाज में सम्मान तथा महत्वपूर्ण स्थान होता था, पुरुषों के समान ही उन्हें धार्मिक संस्थाओं समुदायों तथा विभिन्न सभाओं में बराबरी का हक प्रदान था,

इसलिए वैदिक काल में स्त्रियों को शिक्षा भी प्रदान की जाती थी। पुरुषों के समान स्त्रियाँ स्वतंत्र पूर्वक शिक्षा में भाग लेती थी और वे बिना रोक-टोक शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश करके शिक्षा प्राप्त करती थी।

वैदिक काल में स्त्रियाँ अपने पतियों के साथ यज्ञ में भी भाग लेती थी, छात्रों के समान ही छात्राएँ भी वेदों का अध्ययन करती थी वही शास्त्रार्थ भी सीखती थी ऋग्वेद में विश्ववारा, घोषा, लोपामुद्रा, अपाला जैसी विदुशी महिलाओं का उल्लेख देखने को मिलता है।

पुरुषों के समान ही स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करती थी उनका भी छात्रों के समान उपनयन संस्कार होता था, किंतु वैदिक काल के पश्चात उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों पर कई प्रकार के बंधन कसे जाने लगे और उनकी समाज में स्थिति निरुत्तर होती चली गई।

उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों का सम्मान वैदिक काल की उपेक्षा कम हो गया उन्हें अब समाज में इतना आदर सम्मान प्राप्त नहीं होता था जो कि उन्हें वैदिक काल में प्राप्त होता था। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों का यह अधिकार भी छिन गया कि वह सामाजिक उत्सवों यज्ञ हवन संबंधित कार्यों में भाग भी नहीं ले सकती थी।

इसके साथ ही कई प्रकार के बंधन में उन्हें बांध दिया गया। शिक्षण संस्थाओं में भी जाकर वह अध्ययन नहीं कर सकती थी। इस कारण से उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों का शारीरिक तथा मानसिक विकास भी

अवरुद्ध हो गया। उपनिषद काल में अनेक विदुशी महिलाएं तो हुई है, किंतु योग्य महिलाओं का पता किसी भी साहित्य से नहीं चलता है। महर्षि याज्ञवल्क्य तथा गार्गी का मिथिला के राजा जनक की सभा में किया गया प्रश्न उत्तर हमारे देश के इतिहास में प्रसिद्ध है

कहीं-कहीं पर स्त्री शिक्षकों का विवरण दिखाई देता है शिक्षा प्रदान करने वाली स्त्रियों को उपाध्याय आया आचार्य के नाम से जाना जाता था।


बौद्ध काल में स्त्री शिक्षा Female education in buddhism

बौद्ध काल में प्रारंभ में बौद्ध संघ में स्त्रियों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी, किंतु प्रजापति गौतमी और महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद के बार-बार अनुरोध करने पर उन्होंने स्त्रियों के लिए एक अलग संघ की स्थापना की और उसमें प्रवेश की अनुमति दे दी,

किंतु फिर भी स्त्रियों को बौद्ध काल में हीन दृष्टि से ही देखा जाता था, जो स्त्रियां बौद्ध संघ में प्रवेश लेती थी, उन्हें भिक्षुणी कहा जाता था और उनके लिए बौद्ध भिक्षुओं से कठोर नियम हुआ करते थे,

उन्हें 2 वर्ष तक के लिए कठोर जीवन जीना पड़ता था और कठोर परीक्षा भी देनी पड़ती थी, किंतु बौद्ध काल में स्त्री शिक्षा का प्रचार प्रसार भी पर्याप्त था। बौद्ध महिलाओं के लिए कठोर नियम तो होते थे,

किंतु इन कठोर नियम के चलते ही कई विदुषी महिलाओं ने जन्म लिया कई स्त्रियाँ दर्शनशास्त्र में पारंगत तो कई स्त्रियाँ विभिन्न विषयों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर चुकी थी। बौद्ध काल में स्त्रियाँ आलोचना मीमांसा वेदांत आदि का भी अध्ययन करती थी,

किंतु बौद्धकालीन स्त्री शिक्षा केवल उच्च वर्ग के लोगों के लिए ही थी, निम्न वर्ग के स्त्रियों के लिए शिक्षा जरूरी नहीं समझी जाती थी। इसलिए शिक्षा का स्वरूप इतना व्यापक नहीं हो सका, कि शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य हो सके। बौद्ध काल में स्त्री शिक्षा

इसलिए सफल नहीं हो सकी, क्योंकि उस समय निम्न परिवार की स्त्रियों को संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं थी इसके बावजूद भी समाज में बाल विवाह का प्रचलन था और जनसाधारण अत्यधिक गरीब था।

आपने यहाँ पर वैदिक काल में नारी की शिक्षा (Women's education in Vedic period) के साथ बौद्धकालीन स्त्रियों की शिक्षा व्यवस्था के बारे में पढ़ा।

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  1. वैदिककालीन शिक्षा की विशेषताएँ Features of vedic period education
  2. बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ Features of buddhist periods



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