गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था Gupta Social System

गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था Gupta Social System

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था (Gupta Social System) में। दोस्तों इस लेख में आप गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था,

गुप्तकालीन सामाजिक दशा जान पायेंगे। जो विभिन्न परीक्षाओं में अक्सर पूँछा जाता है। तो आइये दोस्तों शुरू करते है, यह लेख गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था:-


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गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था


गुप्तकालीन सामाजिक दशा Gupta Social System

गुप्तकाल की सामाजिक दशा :- वैदिक काल में जो भारतीय समाज का ढांचा था, वह विभिन्न परिवर्तनों के साथ आज तक विधमान है। वैदिक काल में समाज का जो ग्रामीण स्वरूप था,

वह मौर्य काल में शहरी नागरिकता को प्राप्त कर गया था इस कारण से गुप्त काल में सामाजिक दशा ग्रामीण और नागरिक दोनों ही प्रकार की देखने को मिलती है।

अर्थात कह सकते हैं, कि गुप्तकाल में सामाजिक दशा नागरिक और ग्रामीण दोनों ही प्रकार की समन्वित रूप से विकसित हुई है जिसे हम निम्न प्रकार से समझते हैं:-

 

गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था Gupta Social System

यहाँ पर कुछ प्रमुख बिन्दुओ के आधार पर गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था समझाई गयी है।

गुप्तकालीन वर्ण व्यवस्था Gupta caste system

वैदिक युग में भारतीय समाज को चार भागों में विभाजित कर दिया गया था, जो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र थे और यह वर्ण व्यवस्था गुप्त काल में भी प्रचलन में थी। गुप्त काल में भी ब्राह्मणों को समाज में सबसे प्रमुख स्थान दिया जाता था।

उनका काम अध्यापन का अध्ययन करने का यज्ञ का शिक्षा प्रदान करने का हुआ करता था, जबकि क्षत्रियों को देश की रक्षा करने का कर्तव्य का निर्वाहन करना होता था। वैश्य वर्ण के लोगों का सबसे प्रमुख कार्य वाणिज्य था, वहीं शुद्रो का कर्तव्य सेवा करना तथा निम्न कार्य करना होता था।

वैदिक काल में यह वर्ण व्यवस्था बहुत ही कठोर अनुशासन और नियमों पर आधारित होती थी, किंतु गुप्त काल में इस वर्ण व्यवस्था में मृदुता देखने को मिली। गुप्त काल में जाति का व्यवसाय के विषय में बंधन अब शिथिल हो गया था।

इस युग में अनेक ब्राह्मण व्यक्ति राजा भी हुए और कई क्षत्रिय वर्ण के लोग वैश्य वर्ण का भी कार्य करने लगे थे। इसके अलावा समाज में कुछ अन्य लोगों के अस्तित्व के भी प्रमाण देखने को मिलते हैं।

गुप्तकालीन अभिलेखों से ही सबसे पहले कायस्थ का उल्लेख मिलता है, अर्थात मान सकते हैं, कि गुप्त काल में कायस्थों की एक अलग जाति बन गई थी। इसके अतिरिक्त चांडाल भी एक जाति थी जो अस्पर्श माने जाते थे तथा बस्ती के बाहर रहते थे।


गुप्तकालीन आश्रम व्यवस्था Gupta ashram system

वैदिक काल की प्राचीन आश्रम व्यवस्था गुप्तकाल में भी उपस्थित थी। यहाँ पर व्यक्ति का जीवन ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में विभाजित होता था।

इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य व्यवस्थित व नियमित जीवनयापन करना होता था। अपने व्यक्तित्व का सही प्रकार से विकास करना समाज की सेवा करना तथा समाज में अपना अमूल्य योगदान देना इस आश्रम की मुख्य भूमिका हुआ करती थी।


गुप्तकालीन विवाह और पारिवारिक जीवन Gupta marriage and family life

गुप्तकाल में विवाह एक पवित्र संस्कार माना जाता था, जो 8 संस्कारों में से एक था। स्मृतियों में विवाह को अनिवार्य बताया गया है, जबकि मनुस्मृति के अनुसार जिस प्रकार वायु को पीकर संपूर्ण जंतु जीवन जीते हैं,

उसी प्रकार ग्रहस्थ आश्रम के द्वारा मनुष्य लोकयात्रा का निर्वाह करते हैं। इसीलिए विवाह ना करना पाप भी माना जाता था। गुप्त काल में बहु विवाह का प्रचलन देखने को मिलता था, किंतु अधिकतर विवाह सजातीय विवाह होते थे। अनुलोम - प्रतिलोम विवाह के भी प्रकार वहाँ पर देखने को मिलते थे।

गुप्त काल के इतिहास में विधवा विवाह और सती प्रथा का भी उल्लेख मिलता हैं। समाज में संयुक्त परिवार की प्रधानता सबसे अधिक प्रचलित थी। उस समय का पारिवारिक जीवन सुखी संपन्न हुआ करता था और परिवार संयुक्त परिवार की नींव पर आधारित था।

संयुक्त परिवार में परिवार का मुखिया सबसे वृद्ध व्यक्ति होता था और परिवार के सभी सदस्य उसके आदेश का पालन करते थे, उसके परिवार के सभी छोटे बड़े फैसले उसकी उपस्थिति में ही लिये जाते थे।

स्मृतियों में कहा जाता है, कि पिता के जीवनकाल में बंटवारे की बात करना पाप है, गुप्त काल में पुत्रों को अपने पिता की पारिवारिक संपत्ति में समान अधिकार मिलता था, किंतु पुत्रियों को यह अधिकार प्राप्त नहीं था।


गुप्तकालीन स्त्रियों की दशा Condition of women of the Gupta period

वैदिक काल में जो स्त्रियों को सम्मान प्राप्त हुआ करता था, वह सम्मान गुप्त काल में प्राप्त नहीं होता था। गुप्त काल में कन्याओं का विवाह 12 से 13 वर्ष की आयु में कर दिया जाता था। कन्याओं का उपनयन संस्कार नहीं होता था, उन्हें वैदिक शिक्षा भी प्रदान नहीं की जाती थी,

जो धनी परिवार होते थे, वह अपनी कन्याओं की शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही कर देते थे। गुप्त काल में स्त्रियों को किसी भी प्रकार की पारिवारिक संपत्ति में कोई भी अधिकार नहीं होता था। गुप्त काल में स्त्रियों के लिए पर्दा प्रथा नहीं थी, किंतु जो स्त्रियाँ कुलीन वर्ग की होती थी वह पर्दा में ही रहती थी।

गुप्त काल में विधवाओं की स्थिति बड़ी ही दयनीय थी, उन्हें विवाह करने की अनुमति नहीं थी, वे किसी प्रकार का आभूषण साज-सज्जा सुंदर दिखने के सामान धारण नहीं कर सकती थी। गुप्त काल में सती प्रथा के भी उदाहरण देखने को मिलते हैं।


गुप्तकालीन वस्त्र व आभूषण Gupta clothing and jewelery

गुप्तकालीन मुद्राओं से यह पता चलता है, कि गुप्तकालीन शासक सुंदर और कामदार वस्त्र पहना करते थे, राजा पगड़ी अथवा टोपी, चूड़ीदार पजामा अथवा धोती तथा जूते अधिक पहनते थे,

जबकि समाज के प्रबुद्ध विचारक धनी सम्पन्न नागरिक भी अच्छे वस्त्र धारण किया करते थे। गुप्तकाल में सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रो का प्रचलन हुआ करता था, जबकि महंगे और रेशमी वस्त्र भी थे, जो कुलीन वर्ग के लोग धारण किया करते थे।

गुप्तकालीन स्त्रियाँ चोली, घाघरा, उत्तरीय तथा पुरुष पगड़ी अधोवस्त्र तथा उत्तरीय धारण किया करते थे। वस्त्र सफेद,लाल, नीले, काले व केसरिया रंग के होते थे। गुप्त काल में स्त्री और पुरुष दोनों ही आभूषण पहनने के शौकीन थे, जिनमें स्त्रियाँ कर्णपूर, निश्क, यष्ठी, रसना, जबकि पुरुष केयूर वलय आगुलीयक पहना करते थे।

राज परिवार के जो सदस्य हुआ करते थे, वह सिर पर सिखामणि, चूड़ामणि भी धारण किया करते हैं। गुप्तकालीन स्त्रियाँ अपने केशों को भी सुसज्जित किया करती थी, जिसके लिए वे कई प्रकार के सुगंधित इत्रों का उपयोग करती थी, तथा होठों पर और नेत्रों पर अंगराग लगाती थी।


गुप्तकालीन खानपान की व्यवस्था Catering of gupta period 

गुप्तकालीन मुद्राओं तथा फाहान के वर्णन से यह जानकारी प्राप्त होती है, कि गुप्तकाल में लोग मांसाहारी नहीं हुआ करते थे, गुप्त काल के लोग पूरी तरह से शाकाहारी होते थे। वे चावल गेहूँ, दाल, फल, दूध, घी मक्खन आदि का प्रयोग खानपान के रूप में किया करते थे। उस समय किसी भी प्रकार की नशीली दवाओं नशीली मदिरा आदि का सेवन पूरी तरह से वर्जित था।

लोग पशु हत्या नहीं किया करते थे, नाहीं मुर्गी पाला करते थे, ना सूअर पाला करते थे और ना ही पशुओं को बेचते-काटते थे और ना मांस का सेवन करते थे उस समय के लोग लहसुन और प्याज भी नहीं खाते थे।


गुप्तकालीन मनोरंजन के साधन Entertainment of gupta period 

गुप्त काल में लोग मनोरंजन के लिए पासे, शतरंज, आखेट, भैंसों और मुर्गों की लड़ाई आदि के द्वारा अपना मनोरंजन किया करते थे। गुप्त काल के लोग अपना खाली समय व्यतीत करने के लिए नृत्य, संगीत नाटक, रथ यात्राएँ, उधान यात्राएँ जबकि जुए जैसे मनोरंजन के साधन का उपयोग करते थे।


गुप्तकालीन शिक्षा Education of gupta period 

गुप्त काल की शिक्षा व्यवस्था उन्नत किस्म की थी। राज्य के सभी प्रमुख नगर शिक्षा के केंद्र हुआ करते थे। इन केंद्रों में सबसे प्रमुख नालंदा, उज्जैन, पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा, अयोध्या के नाम आते हैं। इन केंद्रों पर वेद, पुराण, अस्त्र शास्त्र, दर्शन, तर्क शास्त्र और औषधि शास्त्र की शिक्षा प्रदान की जाती थी।


गणिकाएँ और दास Courtesans and slaves

गुप्त काल में गणिकाएँ और दासों का भी उल्लेख मिलता है, जबकि गुप्त काल में वेश्यावृत्ति भी होती थी। समाज में वेश्यावृत्ति करने वाले लोगों को हीनभाव से देखा जाता था, जबकि परिवार में पारिवारिक कार्य और सेवा कार्य करने के लिए दास होते थे,

जो अपने स्वामी की सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति करते थे। दासों को किसी भी प्रकार के अधिकार नहीं थे, गुप्तकाल दासों की स्थिति  चिंताजनक थी।

दोस्तों आपने यहाँ गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था (Gupta Social System) के बारे में पढ़ा। आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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