नैतिक मूल्य किसे कहते हैं प्रकार What are moral values

नैतिक मूल्य किसे कहते हैं प्रकार What are moral values 

नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आजके हमारे एक लेख नैतिक मूल्य किसे कहते हैं इसके प्रकार (What are moral values types) में।

दोस्तों यहाँ पर आप नैतिक मूल्यो के बारे में जानेंगे जिनसे समाज में सम्मान और घर में सुख शांति रहती है। तो आइये शुरू करते है, यह लेख नैतिक मूल्य किसे कहते हैं प्रकार:-

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नैतिक मूल्य किसे कहते हैं प्रकार

नैतिक मूल्य किसे कहते हैं What are moral values 

साधारण रूप से नैतिक मूल्यों को आदर्श संस्कार कहा जाता है। आदर्श संस्कार जिससे व्यक्ति की समाज और देश में पहचान बनती है, क्योंकि नैतिक मूल्य संस्कार व्यक्ति की भावनाओं से जुड़े होते हैं।

दूसरों का सम्मान करना, विनम्रता से बात करना, सत्य बोलना, ईमानदार होना और जो हमारे पास है उसमें संतोष रखना आदि सभी नैतिक मूल्य होते हैं।

अपने बड़े लोगों से इन मूल्यों का अनुसरण करके ही छात्र सीखते हैं, जो छात्रों के जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याओं से निपटने तथा

जीवन में आने वाली कई समस्याओं को सुलझाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं,इसके साथ ही उनके द्वारा समाज में व्यक्ति सम्मान के पात्र बनते है। 

नैतिक मूल्यो के प्रकार Type of moral value 

यहाँ पर प्रमुख नैतिक मूल्यो का बताया गया है, जो जीवन में बहुत ही उपयोगी और लाभदायक है इन्हे जीवन में उतारने से अवश्य ही जीवन सुखी और शांति से व्यतीत होगा।

सत्य Truth 

नैतिक मूल्यों में सत्य का सबसे बड़ा प्रभाव होता है, कियोकि सत्य ही प्रगति का आधार है, इसलिए हर व्यक्ति को सदा ही सत्य का आचरण करना चाहिए, असत्य कथन उसे कभी भी नहीं बोलना चाहिए,

अपितु कुटिल अप्रिय हितकारी वचन बोलना भी असत्य कहलाता है, इसीलिए हमें मृदुभाषी रहना चाहिए, उत्तम वचन बोलना चाहिए।

यद्यपि सत्यम् लोकविरुद्धम् न सदनीयम इस उक्ति के अनुसार यद्यपि सत्य हो पर समाज के हित में उसका उपयोग ठीक नहीं है तो वह वचन नहीं बोलना चाहिए।

दूसरी तरफ हम नम्र बोलते हैं, किंतु उनसे किसी भी जीव मात्र को हानि पहुंचती है उसके हृदय को ठेस लगती है, तो वह वचन भी असत्य वचन होते हैं,

इसीलिए हमेशा हित मित प्रिय वाणी ही मुख से निकाले, इसीलिए तो कहा जाता है,कि वचनों को मुख से निकालने से पहले तौल लें पहले तोलो फिर बोलो,

अर्थात जो कुछ भी आप बोल रहे हो उसको ठीक से समझ लो कि वह किसी के लिए हानिकारक हो सकता है या लाभदायक।

सद्भावना Goodwill

हमारे सभी ग्रंथ यह बताते हैं, कि सभी प्राणियों के प्रति हमें हमेशा दया, ममता, स्नेह एवं सद्भाव का भाव रखना चाहिए। यदि कोई साधु अपने बीमार दुखीकाय विलगित साथी को छोड़कर तत्पश्चरण करता है,

तो वह पाप का भागी होता है, ना कि पुण्य का। मनुष्य को मनुष्य के प्रति तो सद्भाव रहना ही चाहिए, किंतु उन्हें अन्य पशु पक्षी और जानवरों के प्रति भी सद्भावना, प्रेम, करुणा रखना चाहिए,

इसीलिए यह उक्ति बहुत ही प्रभावित होती है, कि जियो और जीने दो। अत्यंत महानता के भाव को लिए प्रत्येक मानव में परस्पर प्रेम सहिष्णुता एवं बंधुत्व भाव का विकास होना चाहिए, तभी तो हिंसा में मारकाट लूट कसूट भ्रष्टाचार का वातावरण का नाश हो सकता है।

संतोष Satisfaction

जब भौतिक पदार्थों की तृष्णा का अभाव हो जाता है तो वहां पर संतोष होता है। शंकराचार्य महाराज जी कहते हैं, कि यह तृष्णा कभी बूढ़ी नहीं होती भले ही मनुष्य बूढ़ा क्यों ना हो जाए।

तृष्णा न जीर्णा: वयमेवा जीर्णा: अर्थात जिस व्यक्ति या मानव को संतोष रूपी धन की प्राप्ति हो जाती है, तो उसके लिए अन्य सभी प्रकार के धन बेकार हो जाते हैं, इसीलिए तो कहा गया है

गोधन,गजधन, बाजधन और रतनधन खान
अब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान

इसलिए मनुष्य को संतोष धारण करने का अभ्यास करना चाहिए और प्रत्येक मनुष्य को इस संसार में तीन वस्तुओं में अवश्य ही संतोष रखना चाहिए।

संतोष: त्रिशु कर्तव्य: स्वदारे भोजने धने।
संतोष: नैव कर्तव्य: अध्ययने जपदानयो।।

अर्थात अपनी स्त्री, भोजन और धन प्राप्ति में संतोष धारण करना चाहिए और इसके विपरीत अध्ययन जप और दान में कभी भी संतोष नहीं करना चाहिए, संतोष के विषय में और भी कहा गया है:-

साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाए।।
रूखी सूखी खाई के ठंडा पानी पी।
देखी पराई चूपड़ी मत ललचावे जी।।

यह वास्तविक सत्य है, कि असंतोष से तो दुख ही दुख होता है। आज सभी व्यक्ति, सभी वर्ग, सभी जाति, सभी राष्ट्र असंतुष्ट हैं, इसीलिए सर्वत्र अशांति ही देखने को मिलती है, लड़ाई झगड़े हो रहे हैं, तनाव है,

संसार विनाश के कगार पर खड़ा दिखाई देता है, जिसका मुख्य कारण असंतोष है। अतः इन सभी विकारों से बचने के लिए हमें संतोष धारण करना चाहिए, तभी हमारा जीवन सुख और शांति से परिपूर्ण हो सकता है। 

ईमानदारी Honesty 

ईमान मतलब अपना धर्म और यह अपना धर्म जिसने खो दिया मानो उसने सब कुछ खो दिया। ईमानदार व्यक्ति अपने आपको आत्मविश्वासी महसूस करता है और उस पर समाज भी विश्वास करता है।

ईमानदारी से समाज के प्रति व्यवहार करने से समाज ईमानदारी के प्रति आकर्षित होगा व उसका अनुसरण करेगा, इसीलिए कहा भी गया है, ऑनेस्टी इस द बेस्ट पॉलिसी (Honesty is the best policy)

अर्थात ईमानदारी सबसे श्रेष्ठ नीति है। ईमानदारी से जो भी व्यक्ति जो कुछ भी प्राप्त करता है, वह उससे संतुष्ट रहता है, मान लो जब आप प्रवास में हो और चारों और अनेक परेशानियाँ हो

इसके बावजूद आपका पर्स चोरी हो गया आप अपने आप को असहाय महसूस कर रहे हैं, तभी कोई अपरिचित आकर आपका पर्स आपके हाथ में रख कर यह कहता है, कि भाई साहब लीजिए

आपका पर्स उस जगह छूट गया था या गिर गया था तब आप को जो आनंद और खुशी होगी उसे आप कैसे व्यक्त करेंगे बस इसी प्रकार की खुशी ईमानदारी व्यक्त करने में प्राप्त होती है।

दोस्तों आपने यहाँ नैतिक मूल्य किसे कहते हैं प्रकार (What are moral values) पढ़े। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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