निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण में अंतर Nireekshan tatha paryavekshan mein antar

निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण में अंतर

निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण में अंतर Nireekshan tatha paryavekshan mein antar

दोस्तों नमस्कार आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण में अंतर (Nireekshan tatha paryavekshan mein antar) में।

दोस्तों इस लेख में आप निरिक्षण तथा पर्यवेक्षण में क्या अंतर है, के साथ स्पष्ट अर्थ जानेंगे। तो आइये करते है शुरू यह लेख निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण में अंतर:-

शैक्षिक पर्यवेक्षण के प्रकार

निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण में अंतर Nireekshan tatha paryavekshan mein antar

पर्यवेक्षण तथा निरीक्षण दोनों शब्दों में अंतर को स्पष्ट करना समझना बहुत ही जरूरी होता है, कियोकि वास्तव में दोनों के अर्थ लगभग एक-दूसरे से

जुड़े होते हैं, अर्थात लगभग समान ही होते हैं, किंतु इनमें कुछ परिस्थितियों तथा समय के आधार पर परिवर्तन भी होता रहता है, जो वास्तव में आवश्यक भी है।

किसी भी तथ्य का निरीक्षण का कार्य निरीक्षक का होता है, और निरीक्षक शब्द सबसे अधिक प्रचलित शब्द हैं,  जो कई दशाओं, स्थितियों के लिए प्रयुक्त भी होता है।

किन्तु कुछ मायने में निरीक्षक सामान्यतः कुछ भ्रम आशंका तथा आतंक को प्रकट करने वाला शब्द जैसा भी होता है, उनमें मुख्यतौर पर आयकर निरीक्षक, पुलिस निरीक्षक, विक्रीकर निरीक्षक ऐसे शब्द होते हैं

जो जनसामान्य में भय तथा आशंका को प्रकट करते हैं। किन्तु किसी विशेष घटना को आंखों से देखना और उसकी यथावत रिपोर्ट प्रस्तुत करना निरीक्षक का कार्य होता है, निरीक्षक दस्तावेज परिस्थितियों में

सुधार लाने की दृष्टि से उनका अवलोकन नहीं करता किंतु वह सही- सही सूचनाएँ अप्रिय तथ्य एकत्रित करके उन्हें रिपोर्ट के रूप में प्रेषित करने का ही कार्य करता है।

शिक्षा के क्षेत्र में विशेष रूप से आजादी के पश्चात भारत के तथा अन्य देशों के शिक्षाविदों ने वैचारिक परिवर्तन के कारण यह अनुभव किया कि निरीक्षक शब्द को जो

अधिक संकुचित  भययुक्त लगता है शैक्षिक प्रिक्रिया में प्रयुक्त करना उचित और न्यायसंगत नहीं है। कियोकि स्वतंत्रता से पूर्व भारत वर्ष की परिस्थितियों में विद्यालय

में यह निरीक्षक शब्द अध्यापकों तथा छात्रों के मन में आतंक उत्पन्न करता था, कियोकि उस समय विद्यालयों में निरीक्षक का कार्य अध्यापकों तथा शिक्षण प्रिक्रिया का दोष खोजना होता था।

इसलिए उस समय निरीक्षक की स्थिति सचमुच भयानक और अधिकारिक प्रकार की होती थी, किंतु वर्तमान समय में शैक्षिक प्रणाली में निरीक्षण के स्थान पर अब

पर्यवेक्षण शब्द को अधिक महत्वपूर्ण और आदरपूर्वक उपयुक्त किया जाता है और यह तर्कसंगत भी माना जाता है। पर्यवेक्षण में भी यद्यपि शिक्षण अधिगम से संबंधित दशाओं का अवलोकन किया जाता है,

किंतु ऐसा मात्र सूचना या तथ्य संकलित करके उन्हें आख्याबंद करके उच्च अधिकारियों को प्रेषित करने की दृष्टि से ना किया जाकर उन दशाओं और परिस्थितियों में सुधार तथा विकास लाने के उद्देश्य से होता है।

यह कार्य वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ विधियों का प्रयोग करते हुए पूर्णतः पूर्वाग्रह मुक्त होकर निष्पक्ष तरीके से संपन्न किया जाता है।

पर्यवेक्षण के द्वारा अध्यापकों के व्यवसायिक विकास के द्वारा उनमें आत्मविश्वास जागता है, पर्यवेक्षण परामर्शदाता मित्र पथ प्रदर्शक आदि

की भूमिका का निर्वाह करता है। माध्यमिक शिक्षा आयोग द्वारा निरीक्षक के स्थान पर पर्यवेक्षक शब्द का प्रयोग सुझाव के रूप में दिया गया था।

प्रो.एस.एन मुखर्जी ने बताया यदि निरीक्षक शब्दों को जो पुलिस इंस्पेक्टर जैसी आतंककारी भावना का परिचायक होता है,

विद्यालय परामर्शदाता अथवा विद्यालय की देखभाल करने वाला शब्द में बदल दिया जाए तो संभवत कुछ अधिक लाभ की आशा की जा सकती है।

इसके विपरीत कुछ विद्वानों का यह भी मानना है, कि भारतवर्ष की परिस्थितियों में केवल निरीक्षक शब्द ही पूरी तरह उपयुक्त है,

विदेशों में शैक्षिक क्षेत्र में जो मित्र भाव या परामर्शदाता का भाव अपनाया जाता है, वह उनकी सभ्यता तथा संस्कृति के अनुकूल होता है

विदेशी वातावरण को भारतीय परिस्थितियों में ज्यों का त्यों नहीं अपनाया जा सकता अतः इस विवाद में अधिक ना उलझकर अमुक व्यक्तियों

को क्या कहकर पुकारा जाए इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि वह किन किन कार्यों को किस भावना के साथ संपन्न करते हैं।

दोस्तों इस लेख में आपने निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण में अंतर (Nireekshan tatha paryavekshan mein antar) पढ़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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  1. शैक्षिक पर्यवेक्षण का अर्थ और परिभाषा
  2. भारतीय शिक्षा नियोजन की विशेषताएँ



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