नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास History of Nalanda University




नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास


नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास History of Nalanda University 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आज के हमारे इस लेख नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास (History of Nalanda University) में।

दोस्तों इस लेख में आप नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कहाँ हुई थी? नालंदा विश्वविद्यालय कहाँ है? नालंदा विश्वविद्यालय का वर्णन के साथ ही नालंदा विश्वविद्यालय का विध्वंस किसने किया?

आदि के बारे में जान पाएंगे तो आइये दोस्तों पढ़ते हैं, यह लेख और जानते है, नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास:-

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नालंदा विश्वविद्यालय कहाँ है Where is Nalanda University

नालंदा विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय की तरह ही एक विशाल तथा प्राचीन विश्वविद्यालय है, जो भारत देश के राज्य बिहार के पटना (Patna) राजधानी  से 88 किलोमीटर दूर राजगीर नामक स्थान के पास बसे एक गांव में स्थित है।

नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म के साथ अन्य धर्मों के भी अनुयायी तथा शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण किया करते थे। यहां पर बौद्ध धर्म की दोनों शाखाओं हीनयान और महायान से संबंधित शिक्षा प्रदान की जाती थी।

इसलिए इस विद्यालय को बौद्ध विश्वविद्यालय के नाम से भी जाना जाता है। नालंदा विश्वविद्यालय की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम के द्वारा की गई। विदेशी यात्री हेनसांग और कई यात्रियों ने नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में वर्णन अपनी पुस्तकों में किया है। 

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना Establishment of Nalanda University

नालंदा विश्वविद्यालय जिसे बौद्ध विश्वविद्यालय के नाम से भी जाना जाता है, कि स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त ने 450 - 470 में की थी।

इसके बाद अन्य गुप्त शासकों ने भी इसे अपना संरक्षण प्रदान किया और विकास में सहयोग प्रदान करते रहे। जिनमें हेमंत कुमार गुप्त (Hemant kumar Gupt) का नाम भी सम्मिलित किया जाता है।

नालंदा विश्वविद्यालय में लगभग 10000 छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों तथा विदेशों से यहाँ आकर रहते थे। उस समय छात्रों की शिक्षा के लिए 2000 शिक्षक मौजूद थे।

गुप्त वंश (Gupt Dynesty) के शासकों के पश्चात अन्य राजवंशों ने भी नालंदा विश्वविद्यालय को अपना संरक्षण प्रदान किया जिनमें वर्धन वंश, पाल वंश आदि का नाम शामिल है। इस विश्वविद्यालय के विकास तथा अध्ययन कार्यों के लिए विदेशों के कई राजवंशो से अनुदान भी प्राप्त होता था।  

नालंदा विश्वविद्यालय के संस्थापक Founder of Nalanda University

नालंदा विश्वविद्यालय के संस्थापक गुप्त साम्राज्य के महान सम्राट कुमारगुप्त थे। जो महान सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के पुत्र थे। किंतु हर्ष के समय में आते-आते यह विश्वविद्यालय काफी प्रसिद्ध हो गया

सम्राट अशोक ने भी अपने शासनकाल के दौरान यहाँ पर एक विशाल बिहार का निर्माण करवाया था। वर्धन वंश तथा पाल वंश के राजाओं ने भी नालंदा विश्वविद्यालय को संरक्षण प्रदान किया और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । 

नालंदा विश्वविद्यालय का वर्णन The description of Nalanda University

नालंदा विश्वविद्यालय एक ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय था जिसे भगवान बुद्ध को समर्पित विश्वविद्यालय भी कहा जाता है। नालंदा विश्वविद्यालय में लगभग 7 विशालकाय कक्ष थे जिनमें 300 से भी अधिक कमरे थे।

इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के लिए छात्रावास की सुविधा उपलब्ध थी। पानी की सुविधा के लिए कुआँ हुआ करता था तथा अन्य सुविधाएँ भी वहाँ पर उपलब्ध थी। नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाले छात्रों से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था।

क्योंकि नालंदा विश्वविद्यालय का खर्च वहाँ के 200 गांव से प्राप्त आय से चलता था। यहाँ पर विद्यार्थियों के लिए बड़े ही कड़े नियम थे। इस विश्वविद्यालय में अध्यापक एक समय में 10 विद्यार्थियों को ही शिक्षा दिया करते थे

और सभी विषयों को मिलाकर एक दिन में लगभग 100 व्याख्यान दिए जाते थे। यहाँ पर एक विशाल पुस्तकालय (Library) भी था जिसका नाम धर्म यज्ञ था। पुस्तकालय 3 भवनों के मिलने से बना हुआ था।

जिनमें रत्न सागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक शामिल थे। नालंदा विश्वविद्यालय में कई धर्मों की शिक्षा दी जाती थी, किंतु महायान शाखा पर विशेष ध्यान दिया जाता था। यहाँ पर पाली भाषा की शिक्षा भी अनिवार्य रूप से दी जाती थी।

उस समय नालंदा विश्वविद्यालय में भारत देश के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही विदेशों के छात्र जैसे कि तिब्बत, चीन, कोरिया आदि से भी आते थे। हेनसांग ने यहाँ पर शिक्षक के रूप में कार्य किया और उन्होंने विद्यार्थियों की संख्या 10,000 से अधिक बताई।

इस विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध शिक्षक धर्मपाल, गुणमति, प्रभावमित्र चंद्रपाल आदि थे। 

नालंदा विश्वविद्यालय को किसने जलाया Who burnt Nalanda University

जब महमूद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया तो उसने भारत के कई प्रदेशों को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसकी भारत पर विजयों में उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक तथा बख्तियार खिलजी की प्रमुख भूमिका रही।

महमूद गौरी ने भारत में जीते गए प्रदेशों में से कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का शासक घोषित किया तथा बख्तियार खिलजी को बिहार का प्रदेश सौप दिया। एक बार बख्तियार खिलजी किसी अज्ञात रोग से

ग्रसित हो गया और उसने अपने सभी हकीमो की बनाई हुई जड़ी बूटियों से युक्त दवाई का सेवन किया, किंतु वह उस रोग से छुटकारा नहीं पा सका।

तभी नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य को बुलाया गया तब बख्तियार खिलजी ने कहा आप किसी भी हिंदुस्तानी दवा का प्रयोग नहीं करेंगे।

आचार्य ने उसकी शर्त मान ली और बख्तियार खिलजी को कुरान के कुछ भागों को पढ़ने के लिए कहा जिसमें उन्होंने दवा का कुछ अदृश्य लेप लगा दिया था।

जैसे ही बख्तियार खिलजी ने कुरान के कुछ पन्नों को पढ़ा जिससे हाथ में थूक लगाने और पन्ने पलटने के कारण वह दवा (Medicine) उनके मुँह में चली गई और वे स्वस्थ हो गए।

किन्तु स्वस्थ होने पर उन्हें खुशी नहीं हुई और उन्हें ऐसा लगने लगा कि उनके हकीम और वैधयों का ज्ञान भारत के हकीम और वैध से बहुत ही कम है।

आक्रोश में आकर उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय को जलाने की अनुमति दे दी। उस समय नालंदा विश्वविद्यालय में इतनी पुस्तकें थी

कि वह लगातार तीन महीने तक जलती रहीं। इस प्रकार नालंदा विश्वविद्यालय का विध्वंस मोहम्मद गौरी के एक सरदार बख्तियार खिलजी ने किया था।

दोस्तों इस लेख में आपने नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास (History of Nalanda university) पड़ा आशा करता हूँ आपको यह लेख अच्छा लगा होगा। 

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